आवारा फिरते थे, जिन गलियों में

आवारा फिरते थे,

जिन गलियों में,

मैं और मेरी आवारगी,

खड़े है अब भी,

उसी मोड़ पे,

तेरी आशिकी,

मेरी दीवानगी...

फुरसत मिले,

तो देख जाना,

वो इश्क़-ए-बानगी....

                        - अभय सुशीला जगन्नाथ 



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