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वो दोस्तों बीच टिफिन की लूट

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  वो दोस्तों बीच टिफिन की लूट, उठा रहे फ़िर मन में हलचल, वो रोटी, पराठे, पूड़ी संग हलवा, वो गोभी-मटर और आलू-परवल, हर इक माँ ने सजाए ममता से, जिनमें अन्नपूर्णा का स्नेह-विह्वल #MothersDay #Mothers #Day अभय सुशीला जगन्नाथ 

सानूं सारियां विसर गईयां राहवां वे, केड़े पासे जाईए सजना

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 "सानूं सारियां विसर गईयां राहवां वे, केड़े पासे जाईए सजना" ये किस मोड़ पर तेरी याद ने घर कर लिया, दिल ने बिना तेरे हर राह बेअसर कर लिया, मैं और मेरी आवारगी फिरते हैं यूँ दर-बदर, तेरे इश्क़-ए-सफ़र ख़ुद को सिफ़र कर लिया.. सानूं सारियां विसर गईयां राहवां वे, केड़े पासे जाईए सजना "I have forgotten all the paths, which way should I go, my beloved ?" बहुत दिनों बाद कोई पंजाबी बिरह रूपक के गीत / कविता सुन कर "बिरहा दा सुल्तान" शिव कुमार बटालवी के " माये नी माये, मैं इक शिकरा यार बनाया " और अमृता प्रीतम के " अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ ", जैसे बिरह और दर्द में डूबे पंजाबी कविताओं की याद आ गयी ! आपको मैं  यहाँ एक और बताता चलूँ कि अमृता प्रीतम ने ही अपने समकालीन शिव कुमार बटालवी के लिए "बिरहा दा सुल्तान" ... यह विशेष उपाधि गढ़ी थी। बिरहा पंजाबी शब्द है जो किसी प्रियजन से बिछड़ने के दुःख को व्यक्त करता है, और बाबा फरीद ने ही अपनी कविता, "बिरहा, बिरहा आखिये, बिरहा तून सुल्तान" के माध्यम से बिरहा को एक सर्वोच्च भावना घोषित किया था ! ...

बगावत होगी इस बार वक्त-ए-दुआ

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 बगावत होगी इस बार वक्त-ए-दुआ, तुझसे और तेरे निज़ाम से ऐ जहान-ए-खुदा, तमाम उम्र जिन सांसों से जीना हुआ, उनकी धड़कनों से क्यूंकर की ये सांसे जुदा #श्रद्धांजलि #माँ #बाबूजी अभय सुशीला जगन्नाथ 

कभी वो सितार की सदा, कहीं ख़ामोश वीरानियाँ

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कभी वो सितार की सदा, कहीं ख़ामोश वीरानियाँ, तेरे मौसिकी के तरन्नुम में वो उम्दा रूह-ए-रवानियाँ ! लिखेंगे किसी रोज़ सब बनारस की हर वो कहानियाँ, उन घाटों की सीढ़ियों पर अब भी ठहरी ज़िंदगानियाँ ! मैं और मेरी आवारगी और उन गलियों की निशानियाँ ! With your soul in every note, and fire in each song, You draw every heart, and lead them along... With your powerful voice, and spirit so long, You carry each listener, right where they belong ! From campus memories, to heights you now embrace, You rise even brighter, with power and grace...                         - Abhay Sushila Jagannath  

हंसा की हिज़्र-ए-चांदनी

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कब तलक गुनगुनाऊँ मैं फ़क़त फ़िराक़ की रागिनी, मेरे अरमानों को भी परवाज़ दे ऐ नाज़नीन हंसिनी, मैं और मेरी आवारगी और हंसा की हिज़्र-ए-चांदनी ! संलग्न छायाचित्र में BHU BSc 98 Batch के  "त्रिदेव" "त्रिमूर्ति" और याराना के संगम की "त्रिवेणी" के त्रिलोकनाथ 🌠 ... बड़े भाई,  KV BHU के सीनियर,  BSc के गुरु सखा और  ABC ( आरा-बलिया-छपरा ) ऑफ भोजपुर के C से... 😲 नहीं-नहीं, भाई ! आप गलत सोच रहे हैं 🤪  A से आरा वाले बाबू साहब के तारीफ़ में C से छपरा वाले के कुछ शब्द... 😁 BHU में 90 के दशक में,  फैकल्टी-फैकल्टी की आवारगी में कभी VT मंदिर, तो कभी बिहारी चाय की दुकान और फ़िर शाम की लंकेटिंग से बचे तो हॉस्टल की आवारा फक्कड़ बैठकी में... ओ हंसिनी , कहां उड़ चली, मेरे अरमानों के पंख लगा के... इस गाने को सुना सुना कर, अपने इश्क़ की कहानी से प्रभावित, मिर्जा ग़ालिब के मशहूर शेर "वो फ़िराक़ और वो विसाल कहां  वो शब-ओ-रोज़ माह-ओ-साल कहां" टाइप का भाव लेकर.. अपने विसाल-ए-यार के गम-ए-इंतजार में...  "त्रिदेव" "त्रिमूर्ति" और याराना के संगम की "त...

For bonds we treasure, pure and true !

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 ना तेरा शहर, ना तेरा मुहल्ला, ना मिला तेरा वो आशियाना, ना मिली मुझे फ़िर तेरी गली, जहां था तेरा वो छत पहचाना  मैं और मेरी आवारगी खोज रहे, लंकेटिंग में वो चाँद पुराना  Somewhere, I once came to know, That wishes for friends, we hold so close, Have a way of seeing, their way through... For bonds we treasure, pure and true ! So here’s my wish,  heartfelt and bright, For every path you take in life... May it lead you where joy exists, And every step be filled with bliss...                                    - Abhay Sushila Jagannath 

ना मिली मुझे फ़िर तेरी गली, जहां था तेरा वो छत पहचाना

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 ना तेरा शहर, ना तेरा मुहल्ला, ना मिला तेरा वो आशियाना, ना मिली मुझे फ़िर तेरी गली, जहां था तेरा वो छत पहचाना  मैं और मेरी आवारगी खोज रहे, लंकेटिंग में वो चाँद पुराना  -  अभय सुशीला जगन्नाथ