"सानूं सारियां विसर गईयां राहवां वे, केड़े पासे जाईए सजना" ये किस मोड़ पर तेरी याद ने घर कर लिया, दिल ने बिना तेरे हर राह बेअसर कर लिया, मैं और मेरी आवारगी फिरते हैं यूँ दर-बदर, तेरे इश्क़-ए-सफ़र ख़ुद को सिफ़र कर लिया.. सानूं सारियां विसर गईयां राहवां वे, केड़े पासे जाईए सजना "I have forgotten all the paths, which way should I go, my beloved ?" बहुत दिनों बाद कोई पंजाबी बिरह रूपक के गीत / कविता सुन कर "बिरहा दा सुल्तान" शिव कुमार बटालवी के " माये नी माये, मैं इक शिकरा यार बनाया " और अमृता प्रीतम के " अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ ", जैसे बिरह और दर्द में डूबे पंजाबी कविताओं की याद आ गयी ! आपको मैं यहाँ एक और बताता चलूँ कि अमृता प्रीतम ने ही अपने समकालीन शिव कुमार बटालवी के लिए "बिरहा दा सुल्तान" ... यह विशेष उपाधि गढ़ी थी। बिरहा पंजाबी शब्द है जो किसी प्रियजन से बिछड़ने के दुःख को व्यक्त करता है, और बाबा फरीद ने ही अपनी कविता, "बिरहा, बिरहा आखिये, बिरहा तून सुल्तान" के माध्यम से बिरहा को एक सर्वोच्च भावना घोषित किया था ! ...