यदु कौन थे ?
यदु कौन थे ?
और जैसे ही मैं उत्तर देता,
आपके बड़े भाई, और मेरे बीच वाले दादा !
सारे लोग ठहाका लगाकर हंसने लगते !
ए जेलर !
एने आव !
और धीरे से अपने गोल गिरोह के दोस्तों को बुदबुदाते हुए बोलते...
"देख लोग, इ हमार सबसे तेज पोता ह, जगरनाथ के बेटा, हमेशा फर्स्ट आवेला, अब इनका से कुछ पूछ लोग !"
और फिर उनका वेद, पुराण और उपनिषद से जुड़ा भारी भरकम प्रश्न और उत्तर ?
चाहे वो महमूरगंज तिराहे का श्री सरदार - हरि सरदार का कटरा हो, जहां मंडुआडीह रेलवे लोको शेड की नौकरी में उन्होंने ज़िंदगी बिता दी !
या फिर छपरा में अपने गांव पर, बचपन के दोस्तों के बीच की बैठकी, जिन लोगों के साथ उन्होंने पहलवानी की और रिटायरमेंट के दिन गुजारे !
हर बार का उनका प्रश्न शुरू होता था, जो मैने ऊपर बताया !
यदु कौन थे ?
और जैसे ही मैं उत्तर देता,
आपके बड़े भाई, और मेरे बीच वाले दादा !
सारे लोग ठहाका लगाकर हंसने लगते, तब दादा जी पापा जो के बारे में बोलते हुए बताते !
"जगरनाथ और हम दूनो जना, जहां भी शादी बियाह में शास्त्रार्थ होत रहे, त हमनी से कोई ना जीते,
तहार पापा के दोहा और श्लोक के साथ साथ भिखारी ठाकुर के गीत में आ हमरा के वेद पुराण अउर उपनिषद में कोई ना हरा सकत रहे"
"तनी आपन इतिहास भी जानल कर बाबू लोग"
और फिर यति ययाति और यदू के साथ साथ कृष्ण और महाभारत की चर्चा में अलग अलग कहानियों का अनवरत सिलसिला !
रामदेव दादा जी, मेरे सबसे छोटे दादा, उनसे बड़े यदु नाथ राय और मेरे अपने दादा और सबसे बड़े सुखदेव राय !
मंडुआडीह लोको शेड और डी एल डब्लू की नजदीकी होने के कारण और पापा के हम उम्र होने की वजह से, अक्सर मेरी साइकिल, मन नहीं लगने पर, महमूरगंज की तरफ चल पड़ती थी !
और मेरा बहुत समय, दादा जी के यहां हरेंद्र चाचाजी और रमेश चाचाजी के साथ बीता जिसकी अनगिनत यादें आज भी जेहन में बसी हुई हैं, साथ में लखनऊ वाले उनके सबसे बड़े बेटे सुरेंद्र चाचाजी, जिनके साथ मेरा BHU की छुट्टियों का समय बीतता था !
महमूरगंज की बहुत से यादें हैं, कुछ खट्टी और कुछ मीठी यादें !
रामदेव दादा जी संग यह सिलसिला निरंतर बिना रुकावट चलता रहा जबतक मैं बनारस से दिल्ली नहीं आया ! और या फ़िर जब कभी छपरा गया !
अब यह सिलसिला सदा के लिए टूट गया, क्योंकि अब रामदेव दादा जी, उनके नहीं बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के वेद, पुराण और उपनिषद के अनुसार गोलोक को चले गए, और पीछे छोड़ गए, मुझे उन्हीं वेद, पुराण और उपनिषद के बीच जिनको मैं अब थोड़ा थोड़ा पढ़ना शुरू किया हूं !
हां जिज्ञासा के अलावा, मन में कहीं न कहीं रामदेव दादा जी और पापा जी के शास्त्रार्थ ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाने की प्रेरणा भी साथ है,
या फिर शायद इसलिए भी कि यदि ईश्वर के श्री चरणों में जब दादा - दादी और मां - पापा जी से मुलाकात हो तो उनके उस प्रश्न का जवाब मैं सही सही दे सकूं कि
यदु कौन थे ?
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दादा जी 
ईश्वर आपको अपने श्री चरणों में स्थान दें, और हर जनम मुझे आप जैसे लोगों के शरण में आशीर्वाद मिले
नमन
ॐ शांति 

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