यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा की कहां अब खुमारी है - निरपेक्ष गुट

1947 की धूल में लिपटी थकी-सी एक कहानी,
टूटी हुई अर्थव्यवस्था, बिखरी हुई युवा जवानी..
फिर भी हौसलों से कहा, हम राह नई बनाएँगे,
ताक़त न सही हथियारों की, हम सच की लौ जलाएँगे..

दो खेमों में बँट कर दुनिया, खड़ी थी इक रण में,
चारों दिशा में आंधी थी, शीतयुद्ध की हर क्षण में..
भारत ने सिर ऊँचा कर, उस वक्त ये ऐलान किया,
न तो हम कहीं झुकेंगे, और न किसी से बैर लिया..

गुटों से ऊपर उठकर हमने, निरपेक्ष अपना राह बनाया,
नैतिकता की ताक़त से अपने, पूरी दुनिया को सबक सिखाया..

कमज़ोर थे हालात मगर, इरादे बड़े फ़ौलादी थे,
इतिहास में हम इसीलिए, हर वक्त इंकलाबी थे..

यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा की कहां अब खुमारी है
सदियों की आँधियों अब भी, हमारी राय-शुमारी है..
कुछ बात है कि हस्ती अब तलक उजियारी है,
भारत की रूह में जो बसी सच्चाई की खुद्दारी है... 

                                                 - अभय सुशीला जगन्नाथ 


Comments

Popular posts from this blog

राधा-कृष्ण ! प्रेम के सात वचन !

बिन फेरे हम तेरे

परी-सुरसुन्दरी, अप्सरा-देवांगना