स्प्लेंडर

इक स्प्लेंडर आज भी गवाह है तेरी रवानगी के,
राहों में जिसने बिखेरे थे किस्से आवारगी के,
अब भी महकते हैं वो लम्हे मेरी यादों में कहीं,
हैदराबादी उस पोरी संग दिल ए दीवानगी के

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गुज़र गए हैं साल मगर मिटे नहीं नक़्श अभी,
लॉन्ग राइड और लॉकेटिंग की वो चुस्कियां
हर राह पे बाक़ी है असर तेरी हमनवाज़ी के
स्पलेंडर पर संग तेरे वो अन्दाज़ बे-अंदाजी के

                                             - अभय सुशीला जगन्नाथ   


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