किरणमयी अंकिता
इस धरा के आदि से, अनादि से उस आस्मां
सिर्फ़ मैं ही हूँ हकीकत, इक मैं ही सारा जहाँ
इक बेटी को जनम देकर तैयार किया मैंने माँ
कब आया जेलर !
रुको चाय बनाते हैं , फिर कुछ खाने के लिए बनाया जायेगा !
नूतन ! देखो बाबिया और जेलर आये हैं ! बुआ दादी के यहाँ ही है ! बाद में आएगी ! बिस्कुट पानी लेकर आओ !
फिर हमारी ममेरी बहन किरण दीदी के प्रश्नो का सिलसिला ! और भाई राजन के पढ़ाई का अपडेट ! साथ साथ अगल बगल बिखरी प्रतियोगी परीक्षाओं से भरी किताबों का ढेर !
राजन और नूतन पर सख्ती के साथ साथ, इक माँ की तरह, समझा कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए प्रेरणा देने से लेकर खुद भी उन परीक्षाओं के लिए घर के काम काज के बाद समय देना , ये बस किरण दीदी ही कर सकती थी !
खुद में एक प्रेरणा थी मेरी किरण दीदी !
मुझसे बहुत प्रसन्न रहती थी, क्यूंकि एक तो मैं उनको कभी कभी गणित के सवालों में मदद करता था, परन्तु ज्यादा वो इस बात पर ज्यादा खुश होती थीं कि मैं उनके प्रयोगों से बने तरह-तरह व्यंजन जिनकी वह बेहद शौकीन थीं, उनको मैं ना सिर्फ चाव से खाता था, बल्कि यदि कोई कमी हो तो भी बड़े सलीके से समझा देता था !
ममेरी दीदी किरण, छोटा भाई राजन और छोटी बहन नूतन इन तीनों के बीच रहने की वजह से और राजू मामा जी की वजह से मुझे सिविल सर्विसेज के बारे में जानने का मौका मिला , क्यूंकि मैं तो बचपन से इंजीनियरिंग का शौक रखा था !
सब के सब तैयारी में मुझसे भी तेज थे बस एक चीझ में मैं भारी पड़ता था म, मैथमेटिक्स और जनरल एपटीच्यूड !
मगर एक और चीझ थी जिसमे दीदी और मैं एक दम टक्कर के थे, गरम चाय !
हम दोनों चाय के सबसे बड़े वाले शौकीन थे , इसलिए भी हम दोनों की खूब बनती थी, तो चाय पर चर्चा हमारी ममेरी बहन और भाइयों का पुराना कॉपीराइट है !
ये किरण दीदी का नैसर्गिक रूप था, प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबो पर टॉपर्स की तस्वीर देख नूतन और राजन को प्रेरित करना, लेकिन मैं जनता था कि दीदी खुद भी उन तस्वीरों में अपने को खोजती थीं, कि मैं भी इन समीज सलवार और साड़ी में बंधी, सूरज की किरण, इक ना इक रोज़ अपने प्रकाश को DM/SDM बनकर दुनियाँ की दिखाऊँ कि...
इस धरा के आदि से, अनादि से उस आस्मां
सिर्फ़ मैं ही हूँ हकीकत, इक मैं ही सारा जहाँ
परन्तु नियति को शायद कुछ और मंजूर था , अपरिहार्य कारण और स्वास्थय कि वजह से वह समय से पहले भगवान् के पास चली गयीं , परन्तु पीछे छोड़ गयी , राजन जो एक बार IAS Mains तक पहुंचा , छोटी बहन जो CDPO बनी , और दो बच्चे अंकुर और अंकिता...
क्यूंकि प्रशासनिक अधिकारी वाला उसका अपना सपना अबतक अधूरा था , सो वो उन दोनों बच्चों मे सजाये हुए चली गयी !
इसलिए मैंने एक और लाइन लिखी...
" इक बेटी को जनम देकर तैयार किया मैंने माँ "
तो अब उस ऊपर की शुरू वाली पंक्तयों के संपूर्ण भाव को आप समझ रहे होंगे...
इस धरा के आदि से, अनादि से उस आस्मां
सिर्फ़ मैं ही हूँ हकीकत, इक मैं ही सारा जहाँ
इक बेटी को जनम देकर तैयार किया मैंने माँ
अंकिता !
एक समय राजेंद्र कॉलेज छपरा की टॉपर एंड गोल्ड मेडलिस्ट ऑफ़ विमेंस कॉलेज, पटना... आज अपने माँ, किरण दीदी के अधूरे पड़े सपनों की तरफ एक कदम आगे बढ़ा दी, क्योंकि आज BPSC के घोषित परिणामों में उसका 272 रैंक आया है !
अंकिता तुमने बहुत मेहनत की है, और आगे भी करते रहना है , क्यूंकि अभी और भी मुकाम हासिल करने हैं, शुभकामनाएं बेटा जी !
किरण दीदी ! और बड़े मामाजी स्वर्गीय बिंदेश्वरी राय जी, आज सब हमारे पूरे घर, गांव और शहर छपरा, सारण के शुभचंतकों के साथ खुश होंगे, और अंकिता को आईएएस बनने की शुभकामनाएं दे रहे होंगे !
परन्तु मैं और मेरी बहन, अपने चाय के साथ !
जो मेरी यादों में, कहीं से पढ़ रही होगी,
मेरा लिखा, उसके लिए ...
पीले पड़े पन्नों, फटे किनारों, हर तहरीर-ए-हरफ़ तू ज़िन्दा है
इक डायरी में उलझी-सुलझी सी, वो बचपन अभी ताबिंदा है
ताबिन्दा = किरणमयी
तहरीर-ए-हरफ़ = शब्दों की लिखावट
#Toppers #BPSC #BIHAR #UPSC #IAS
#RajendraCollege #Jpuniversity #Chhapra #Saran
#WomensCollege #Patna #बिहार
- अभय सुशीला जगन्नाथ
सिर्फ़ मैं ही हूँ हकीकत, इक मैं ही सारा जहाँ
इक बेटी को जनम देकर तैयार किया मैंने माँ
कब आया जेलर !
रुको चाय बनाते हैं , फिर कुछ खाने के लिए बनाया जायेगा !
नूतन ! देखो बाबिया और जेलर आये हैं ! बुआ दादी के यहाँ ही है ! बाद में आएगी ! बिस्कुट पानी लेकर आओ !
फिर हमारी ममेरी बहन किरण दीदी के प्रश्नो का सिलसिला ! और भाई राजन के पढ़ाई का अपडेट ! साथ साथ अगल बगल बिखरी प्रतियोगी परीक्षाओं से भरी किताबों का ढेर !
राजन और नूतन पर सख्ती के साथ साथ, इक माँ की तरह, समझा कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए प्रेरणा देने से लेकर खुद भी उन परीक्षाओं के लिए घर के काम काज के बाद समय देना , ये बस किरण दीदी ही कर सकती थी !
खुद में एक प्रेरणा थी मेरी किरण दीदी !
मुझसे बहुत प्रसन्न रहती थी, क्यूंकि एक तो मैं उनको कभी कभी गणित के सवालों में मदद करता था, परन्तु ज्यादा वो इस बात पर ज्यादा खुश होती थीं कि मैं उनके प्रयोगों से बने तरह-तरह व्यंजन जिनकी वह बेहद शौकीन थीं, उनको मैं ना सिर्फ चाव से खाता था, बल्कि यदि कोई कमी हो तो भी बड़े सलीके से समझा देता था !
ममेरी दीदी किरण, छोटा भाई राजन और छोटी बहन नूतन इन तीनों के बीच रहने की वजह से और राजू मामा जी की वजह से मुझे सिविल सर्विसेज के बारे में जानने का मौका मिला , क्यूंकि मैं तो बचपन से इंजीनियरिंग का शौक रखा था !
सब के सब तैयारी में मुझसे भी तेज थे बस एक चीझ में मैं भारी पड़ता था म, मैथमेटिक्स और जनरल एपटीच्यूड !
मगर एक और चीझ थी जिसमे दीदी और मैं एक दम टक्कर के थे, गरम चाय !
हम दोनों चाय के सबसे बड़े वाले शौकीन थे , इसलिए भी हम दोनों की खूब बनती थी, तो चाय पर चर्चा हमारी ममेरी बहन और भाइयों का पुराना कॉपीराइट है !
ये किरण दीदी का नैसर्गिक रूप था, प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबो पर टॉपर्स की तस्वीर देख नूतन और राजन को प्रेरित करना, लेकिन मैं जनता था कि दीदी खुद भी उन तस्वीरों में अपने को खोजती थीं, कि मैं भी इन समीज सलवार और साड़ी में बंधी, सूरज की किरण, इक ना इक रोज़ अपने प्रकाश को DM/SDM बनकर दुनियाँ की दिखाऊँ कि...
इस धरा के आदि से, अनादि से उस आस्मां
सिर्फ़ मैं ही हूँ हकीकत, इक मैं ही सारा जहाँ
परन्तु नियति को शायद कुछ और मंजूर था , अपरिहार्य कारण और स्वास्थय कि वजह से वह समय से पहले भगवान् के पास चली गयीं , परन्तु पीछे छोड़ गयी , राजन जो एक बार IAS Mains तक पहुंचा , छोटी बहन जो CDPO बनी , और दो बच्चे अंकुर और अंकिता...
क्यूंकि प्रशासनिक अधिकारी वाला उसका अपना सपना अबतक अधूरा था , सो वो उन दोनों बच्चों मे सजाये हुए चली गयी !
इसलिए मैंने एक और लाइन लिखी...
" इक बेटी को जनम देकर तैयार किया मैंने माँ "
तो अब उस ऊपर की शुरू वाली पंक्तयों के संपूर्ण भाव को आप समझ रहे होंगे...
इस धरा के आदि से, अनादि से उस आस्मां
सिर्फ़ मैं ही हूँ हकीकत, इक मैं ही सारा जहाँ
इक बेटी को जनम देकर तैयार किया मैंने माँ
अंकिता !
एक समय राजेंद्र कॉलेज छपरा की टॉपर एंड गोल्ड मेडलिस्ट ऑफ़ विमेंस कॉलेज, पटना... आज अपने माँ, किरण दीदी के अधूरे पड़े सपनों की तरफ एक कदम आगे बढ़ा दी, क्योंकि आज BPSC के घोषित परिणामों में उसका 272 रैंक आया है !
अंकिता तुमने बहुत मेहनत की है, और आगे भी करते रहना है , क्यूंकि अभी और भी मुकाम हासिल करने हैं, शुभकामनाएं बेटा जी !
किरण दीदी ! और बड़े मामाजी स्वर्गीय बिंदेश्वरी राय जी, आज सब हमारे पूरे घर, गांव और शहर छपरा, सारण के शुभचंतकों के साथ खुश होंगे, और अंकिता को आईएएस बनने की शुभकामनाएं दे रहे होंगे !
परन्तु मैं और मेरी बहन, अपने चाय के साथ !
जो मेरी यादों में, कहीं से पढ़ रही होगी,
मेरा लिखा, उसके लिए ...
पीले पड़े पन्नों, फटे किनारों, हर तहरीर-ए-हरफ़ तू ज़िन्दा है
इक डायरी में उलझी-सुलझी सी, वो बचपन अभी ताबिंदा है
ताबिन्दा = किरणमयी
तहरीर-ए-हरफ़ = शब्दों की लिखावट
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#RajendraCollege #Jpuniversity #Chhapra #Saran
#WomensCollege #Patna #बिहार
- अभय सुशीला जगन्नाथ

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